लखनऊ

सरोजिनी नगर तहसील में फरियादी बेहाल: बार एसोसिएशन की चिट्ठी भी बेअसर, ‘साहब’ एसी में मस्त, जनता ईंटों के भरोसे त्रस्त!

सरोजनीनगर/लखनऊ ( करण वाणी, न्यूज़)। सरकारी तंत्र की असंवेदनशीलता और लापरवाही किस कदर हावी है, इसका जीता-जागता सबूत लखनऊ की सरोजिनी नगर तहसील में देखने को मिल रहा है। आम जनता और फरियादियों की समस्याओं को दूर करने के बड़े-बड़े दावे करने वाला प्रशासन इस कदर सोया हुआ है कि वकीलों और बार एसोसिएशन द्वारा बार-बार लिखित और मौखिक शिकायत करने के बाद भी कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है।

बार एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष की चिट्ठी भी हुई बेअसर

मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरोजिनी नगर तहसील बार एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष दिनेश सिंह चौहान (एडवोकेट) ने खुद इस संबंध में तहसील दिवस प्रभारी को बाकायदा एक लिखित प्रार्थना पत्र (चिट्ठी) सौंपा है।

इस पत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा है कि न्यायालय के बाहर अधिवक्ताओं और दूर-दराज से आने वाले वादकारियों (फरियादियों) के बैठने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। उन्होंने अपनी चिट्ठी में साफ तौर पर इस बात का जिक्र किया है कि:

इस संबंध में तहसील दिवस में कई बार प्रार्थना पत्र दिया गया और तहसील प्रशासन से मौखिक रूप से भी कई बार कहा गया, लेकिनप्रशासन ने आज तक कोई सुध नहीं ली और ही कोई कार्यवाही की गई।

एक तरफ जहां तहसील के बड़े-बड़े अधिकारी और ‘साहब लोग’ अपने बेहतरीन, आरामदायक एसी चेंबरों में महंगी कुर्सियों पर बैठकर फाइलों को निपटाते हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के असली मालिक यानी जनता के बैठने के लिए जो एकमात्र लोहे का बेंच रखा गया है, उसकी हालत देखकर सिर शर्म से झुक जाता है।

यह बेंच पूरी तरह टूट चुका है और इसके पैर गायब हैं। इस टूटे हुए बेंच को दो ईंटों के सहारे टिकाकर खड़ा किया गया है। यह सिर्फ एक बेंच नहीं टूटा है, बल्कि यह तहसील प्रशासन की व्यवस्था का जनाजा है जो ईंटों के भरोसे चल रहा है। इस टूटे बेंच पर बैठना किसी भी समय किसी बड़े हादसे को दावत दे सकता है।

जब वकीलों और बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों की लिखित और मौखिक अपीलों को कूड़ेदान में डाल दिया जाता है, तो एक आम गरीब फरियादी की बिसात ही क्या है? क्या सरोजिनी नगर तहसील प्रशासन इस घोर लापरवाही को संज्ञान में लेकर नई बेंचों की व्यवस्था करेगा या फिर साहब लोग एसी की हवा खाते रहेंगे और जनता इसी तरह ईंटों के सहारे टिके टूटे बेंचों पर बैठने को मजबूर रहेगी?

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