अपराध

योगी सरकार के लिए असली चुनौती समाजवादी नहीं… UP पुलिस है

जब सत्ता के इतने क़रीबी विधायक को भी न्याय के लिए दबाव बनाना पड़े, तो आम लोगों की उम्मीदें कितनी कमज़ोर होंगी, अंदाज़ा लगाइए।

पंकज सिंह चौहान

लगता है, पुलिस ने ही सरकार गिराने की सुपारी ले रखी है

लखनऊ कमिश्नरेट के बिजनौर थाने का मामला इस वक़्त पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय है। कहा जा रहा है कि योगी सरकार के लिए असली चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि खुद UP पुलिस की ढीली, बेपरवाह और बेलगाम कार्यशैली बन चुकी है।

कानून-व्यवस्था का हाल ये है कि अब अपराधी खुलेआम आतंक मचा रहे हैं और पुलिस उन्हीं के साथ खड़ी दिखती है।

बिजनौर क्षेत्र में एक गिरोह लंबे समय से अवैध कब्ज़ा, धमकी, मारपीट और भय फैलाने जैसी गतिविधियों में लिप्त था। ताज़ा घटना में इन लोगों ने पीड़ित पक्ष पर हमला कर दुकान पर कब्ज़ा करने और जान से मारने की धमकी दी। लेकिन पुलिस ने शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय, पीड़ित पक्ष का मुक़दमा दर्ज करने से ही इंकार कर दिया। पुलिस की यह चुप्पी सिर्फ़ सवाल नहीं उठाती, बल्कि इस बात की ओर इशारा करती है कि कहीं न कहीं थाना स्तर पर गंभीर सांठगांठ चल रही है।

विधायक की ताक़त, पुलिस की हदें और सिस्टम की सच्चाई

मामला जब सरोजिनी नगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह के पास पहुँचा, तो उन्होंने अपने प्रतिनिधियों, कार्यकर्ताओं और कार्यालय स्टाफ़ को सीधे बिजनौर थाने भेजा। वहाँ धरना हुआ — वो भी किसी आम व्यक्ति का नहीं, बल्कि सत्ता के बेहद क़रीबी और ताक़तवर विधायक के प्रतिनिधियों का।

राजेश्वर सिंह पूर्व में एक बड़े प्रशासनिक अधिकारी रह चुके हैं, उनकी पत्नी यूपी की वरिष्ठ IPS अधिकारी हैं, और उनके बहनोई फिलहाल यूपी पुलिस के मुखिया हैं। इतना ही नहीं, राजेश्वर सिंह को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सबसे क़रीबी विधायकों में से एक माना जाता है।

इसके बावजूद, मुक़दमा दर्ज कराने के लिए उनके प्रतिनिधियों को धरने पर बैठना पड़ा। घंटों की मशक्कत और दबाव के बाद जाकर एफआईआर दर्ज हुई। अब सोचिए, जब इतनी पहुँच और ताक़त रखने वाले विधायक को न्याय के लिए धरना देना पड़े, तो आम जनता की हालत क्या होगी?

यूपी पुलिस पर यह सवाल नया नहीं है, लेकिन यह घटना एक बार फिर योगी सरकार के “Zero Tolerance” के दावे को मज़ाक़ बना रही है।

क्योंकि अब ऐसा लगता है कि सरकार समाजवादी पार्टी से नहीं, अपनी ही पुलिस से जूझ रही है।

सवाल साफ़ है — जब पुलिस ही सत्ता के आदेशों से ऊपर हो जाए, तो फिर कानून का राज किसका है — सरकार का या थाना प्रभारी का?

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