
पंकज सिंह चौहान
राजस्थान के झालावाड़ से आई एक दिल दहला देने वाली खबर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एक सरकारी स्कूल की जर्जर बिल्डिंग अचानक ढह गई, और उसके मलबे में दब गए मासूम बच्चे। 7 नन्ही जानें इस हादसे में काल के गाल में समा गईं, जबकि 9 बच्चे गंभीर रूप से घायल हैं। यह सिर्फ एक हादसा नहीं था – यह सरकारी तंत्र की लापरवाही, शिक्षा प्रणाली की अनदेखी और निजी स्कूलों को संरक्षण देने की क्रूर साजिश का पर्दाफाश है।
झालावाड़ के एक छोटे से गांव में स्थित यह सरकारी स्कूल वर्षों से मरम्मत की मांग कर रहा था। छत से टपकता पानी, दीवारों पर फैली दरारें और कमजोर नींव – यह सब देखकर भी अधिकारी आंखें मूंदे बैठे रहे। स्कूल के शिक्षक और अभिभावकों ने कई बार जिला प्रशासन को पत्र लिखे, लेकिन हर बार जवाब आया – “बजट नहीं है, अगली मीटिंग में देखेंगे।”
और फिर आई वो मनहूस सुबह…
बच्चे क्लासरूम में बैठे पढ़ाई कर रहे थे। अचानक ज़ोर की आवाज़ आई और कुछ ही पलों में छत भरभराकर गिर गई। चीखें, रोना, और धूल का गुबार – मानो सब कुछ थम सा गया हो। गांव वाले दौड़ पड़े, अपने हाथों से मलबा हटाने लगे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
7 मासूम बच्चे अब इस दुनिया में नहीं रहे।
सवाल उठते हैं:
• क्यों नहीं हुई समय रहते बिल्डिंग की मरम्मत?
• क्यों निजी स्कूलों को तो लाखों के फंड और मान्यता दी जाती है, लेकिन सरकारी स्कूलों को नज़रअंदाज़ किया जाता है?
• क्या बच्चों की जान इतनी सस्ती हो गई है?
दरअसल, यह हादसा एक बड़े सिस्टम की असफलता का प्रतीक है। शिक्षा के नाम पर करोड़ों का बजट आता है, लेकिन उसमें से बहुत कुछ अफसरशाही और कमीशनखोरी की भेंट चढ़ जाता है। सरकारी स्कूलों को जानबूझकर उपेक्षित रखा जाता है, ताकि गरीब और मध्यमवर्ग के बच्चे मजबूर होकर महंगे प्राइवेट स्कूलों में जाएं।
राजनीतिक चुप्पी और मुआवज़े का खेल:
घटना के बाद नेताओं के बयान आए – “जांच होगी”, “मुआवज़ा दिया जाएगा”, “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा”। लेकिन ये वही घिसे-पिटे जुमले हैं, जो हर हादसे के बाद सुनने को मिलते हैं। असल में न कोई जांच पूरी होती है, न कोई दोषी जेल जाता है।
एक मृत छात्र की मां ने मीडिया से कहा –
“सरकारी स्कूल में पढ़ाना मजबूरी थी, लेकिन हमें क्या पता था कि हमारे बच्चे की कब्र वही स्कूल बन जाएगा।”
झालावाड़ का यह हादसा कोई पहली घटना नहीं है। लेकिन अगर अब भी सरकार नहीं चेती, तो यह आखिरी भी नहीं होगी।
जरूरत है शिक्षा को राजनीति से ऊपर उठाने की।
जरूरत है स्कूलों को इमारत नहीं, मंदिर समझकर उन्हें सुरक्षित बनाने की।
और सबसे बड़ी जरूरत है – इन मासूमों की मौत का हिसाब मांगने की।
शब्दों से नहीं, अब सिस्टम से जवाब चाहिए… वरना अगला मलबा किसी और स्कूल की मासूम जानें ले जाएगा।



