अपराधी को मान्यता, पत्रकारों को प्रतीक्षा — जवाब दे सूचना विभाग और भारत समाचार!
राज्य मुख्यालय की मान्यता सीधे मुख्यमंत्री व अन्य वरिष्ठ नेताओं तक पहुंच देती है। यदि आपराधिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति यह मान्यता लेकर संवेदनशील कार्यक्रमों तक पहुंचता रहा, तो यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। अब सवाल है — जांच प्रक्रिया में लापरवाही किस स्तर पर हुई? या फिर जुगाड़ तंत्र में सब संभव है।

पंकज सिंह चौहान/करण वाणी
लखनऊ। साल 2009 के फतेहपुर चर्चित हत्या कांड में अदालत द्वारा हाल ही में सुनाई गई उम्रकैद की सज़ा के बाद राज्य की पत्रकार मान्यता प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
मामले में दोषी ठहराए गए सीमाब नक़वी, जो भारत समाचार चैनल से जुड़े बताए जाते थे, राज्य मुख्यालय के मान्यता प्राप्त पत्रकार रहे हैं। जानकारी के अनुसार उन्हें मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं के कार्यक्रमों तथा अति संवेदनशील सरकारी परिसरों तक पहुंच प्राप्त थी।
यहीं से विवाद गहराता है।
राज्य मुख्यालय की मान्यता के लिए संपादक का अधिकृत पत्र, LIU (लोकल इंटेलिजेंस यूनिट) की जांच और पुलिस सत्यापन अनिवार्य प्रक्रिया मानी जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि हत्या के मामले में आरोपी रहे व्यक्ति को इन सभी औपचारिकताओं के बाद मान्यता कैसे प्रदान की गई?
भारत समाचार से सवाल
• क्या चैनल प्रबंधन ने संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि की पूर्ण जानकारी ली थी?
• संपादकीय स्तर पर अधिकृत पत्र जारी करते समय क्या आपराधिक प्रकरण की जानकारी थी?
• यदि थी, तो उसे मान्यता प्रक्रिया में क्यों नहीं दर्शाया गया?
सूचना विभाग और सचिवालय प्रशासन से सवाल
• LIU और पुलिस सत्यापन के दौरान क्या रिपोर्ट दी गई थी?
• क्या किसी स्तर पर आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया?
• अंतिम स्वीकृति किस अधिकारी ने और किस आधार पर दी?
• क्या मान्यता प्रक्रिया केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है?
पत्रकार संगठनों का कहना है कि जहां एक ओर जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों को सचिवालय पास और मान्यता के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है, वहीं ऐसे मामलों से पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
मामला केवल एक व्यक्ति की सज़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और मान्यता प्रणाली की पारदर्शिता से जुड़ा विषय बन चुका है।
अब मांग उठ रही है कि राज्य मुख्यालय की सभी वर्तमान मान्यताओं की समीक्षा की जाए, सुरक्षा मानकों के अनुरूप दोबारा सत्यापन कराया जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है तो जिम्मेदारी तय की जाए।
इस पूरे प्रकरण ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है —
क्या ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों को प्रतीक्षा में रखकर व्यवस्था ने गलत लोगों को प्राथमिकता दी?
जवाब अब संबंधित संस्थानों को देना होगा।


