संपादकीय

सूचना विभाग में अब पत्रकार की कोई औक़ात नहीं! पत्रकारों की स्थिति पर एक कड़वा लेकिन सच्चा अनुभव…

आज पहली बार महसूस हुआ कि पत्रकारिता सिर्फ़ कलम का संघर्ष नहीं, अब यह सम्मान का भी संघर्ष बन चुकी है।

पंकज सिंह चौहान

आज पहली बार सूचना निदेशक से मिलने उनके कार्यालय पहुँचा था। सोचा था कि कई सालों से लगातार सरकार की नीतियों और योजनाओं को जनता तक पहुँचाने वाले एक छोटे पत्रकार की बात भी शायद सुनी जाएगी। पर जो देखा, उसने मन को सचमुच झकझोर दिया।

कार्यालय के बाहर सिर्फ़ मैं ही नहीं, बल्कि कई वरिष्ठ और नामचीन पत्रकार भी खड़े थे, हर कोई उम्मीद लिए आया था कि शायद आज उनकी भी बात सुनी जाएगी। सबने अपने विज़िटिंग कार्ड भेजे, लेकिन न किसी को बुलाया गया, न किसी की बात सुनी गई, न किसी को सम्मान मिला।

जिस विभाग का दायित्व मीडिया और सूचना से जुड़ा है, वहाँ पत्रकारों की ऐसी अनदेखी देखकर मन बहुत आहत हुआ। आज समझ आया कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी समस्या कोई और नहीं — बल्कि हम ख़ुद हैं।

क्योंकि हमने धीरे-धीरे सिस्टम की चापलूसी को अपनी मजबूरी मान लिया है। हमने सवाल पूछना छोड़ दिया, और बदले में सिर्फ़ ‘सर’ कहने की आदत डाल ली।

जहाँ सच्चाई लिखने वाला पत्रकार दरवाज़े के बाहर खड़ा रह जाता है, और चापलूस अंदर तक पहुँच जाता है, वहाँ लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नींव हिल जाती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी हमेशा कहते हैं कि पत्रकार समाज का दर्पण हैं, लेकिन अगर यही दर्पण टूटने लगे, तो सच दिखाने वाला चेहरा कहाँ बचेगा?

भैया, आज जो देखा, उससे लगा कि पत्रकारिता अब सिर्फ़ ख़बरों की नहीं रही, यह अब सम्मान, अस्तित्व और आत्मसम्मान की लड़ाई बन चुकी है।

और शायद इस दुर्दशा के ज़िम्मेदार हम पत्रकार खुद भी हैं, क्योंकि हमने अपनी कलम को सत्ता के इशारे पर झुकाना शुरू कर दिया है। जब तक हम एक नहीं होंगे, तब तक चापलूसी करने वाले आगे और सच्चाई लिखने वाले दरवाज़े के बाहर ही खड़े रहेंगे।

अब वक्त आ गया है कि मुख्यमंत्री जी और सूचना विभाग इस सच्चाई को समझें, पत्रकार को एहसान नहीं, सम्मान चाहिए।

आज पहली बार महसूस हुआ कि पत्रकारिता सिर्फ़ कलम का संघर्ष नहीं, अब यह सम्मान का भी संघर्ष बन चुकी है।

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