राजनीति

क्या था वक्फ अधिनियम 1995 और क्या-क्या बदला वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 में, समझिए पूरी बात

नए विधेयक में साफ किया गया है कि यदि किसी सरकारी संपत्ति को गलती से वक्फ के रूप में दर्ज कर लिया गया है, तो वह अब वक्फ नहीं मानी जाएगी।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने 02 अप्रैल को लोकसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 पेश किया। वक्फ अधिनियम, 1995 में व्यापक संशोधन करने वाले इस विधेयक पर 8 घंटे की चर्चा निर्धारित है, जिसे ज़रूरत पड़ने पर बढ़ाया भी जा सकता है। इसके साथ ही मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024 भी विचार और पारित कराने के लिए सदन में पेश किया गया।

गौरतलब है कि वक्फ (संशोधन) विधेयक पहली बार अगस्त 2023 में पेश किया गया था। इसके बाद इसे भाजपा सांसद जगदंबिका पाल की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया था। इस विधेयक का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना, 1995 के कानून की खामियों को दूर करना और प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाना है। हालांकि, विपक्ष ने इसे वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता पर प्रहार बताया है और सरकार पर राजनीतिक मंशा से प्रेरित होने का आरोप लगाया है।

क्या-क्या बदला है वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 में?

‘उपयोग के आधार पर वक्फ’ की अवधारणा खत्म:

अब कोई ज़मीन केवल इस आधार पर वक्फ नहीं मानी जाएगी कि उसका उपयोग लंबे समय से वक्फ के तौर पर हो रहा है। सिर्फ वही ज़मीन वक्फ मानी जाएगी जो विधिवत रूप से वक्फ घोषित या समर्पित हो।

ज़मीन दान के लिए शर्तें कड़ी:

जो व्यक्ति वक्फ के लिए ज़मीन दान करेगा, उसे कम से कम पिछले पांच वर्षों से मुस्लिम होना ज़रूरी होगा। इसके अलावा, नए प्रावधानों में मुस्लिम महिलाओं के विरासत अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की गई है।

सरकारी ज़मीन पर स्पष्टता:

1995 के कानून में यह स्पष्ट नहीं था कि क्या सरकारी ज़मीन वक्फ घोषित हो सकती है। नए विधेयक में साफ किया गया है कि यदि किसी सरकारी संपत्ति को गलती से वक्फ के रूप में दर्ज कर लिया गया है, तो वह अब वक्फ नहीं मानी जाएगी। विवाद की स्थिति में वक्फ बोर्ड की जगह अब ज़िला कलेक्टर अंतिम निर्णय देगा और मामला राज्य के भू-राजस्व कानूनों के तहत निपटाया जाएगा।

वक्फ घोषित करने का अधिकार अब बोर्ड के पास नहीं:

अब वक्फ संपत्ति घोषित करने का अधिकार वक्फ बोर्ड की बजाय राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों के पास होगा।

सर्वे की ज़िम्मेदारी बदली:

पहले वक्फ संपत्तियों का सर्वे सर्वे आयुक्त और अतिरिक्त आयुक्त द्वारा किया जाता था। अब यह ज़िम्मेदारी ज़िला कलेक्टर को दी गई है, जिससे इसे राज्य के भूमि रिकॉर्ड के साथ समन्वित किया जा सके।

केंद्रीय वक्फ परिषद का पुनर्गठन:

1995 के कानून के अनुसार इसके सभी सदस्य मुस्लिम होते थे, जिनमें दो महिलाएं अनिवार्य थीं। नए विधेयक में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान है। अब सांसदों, पूर्व न्यायाधीशों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों का मुस्लिम होना अनिवार्य नहीं होगा। हालांकि, मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधि, इस्लामी क़ानून के जानकार और वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मुस्लिम ही रहेंगे। दो मुस्लिम महिलाओं की मौजूदगी भी अनिवार्य होगी।

राज्य वक्फ बोर्ड में भी बदलाव:

पहले इसमें दो निर्वाचित मुस्लिम सांसद, विधायक या बार काउंसिल सदस्य शामिल हो सकते थे। अब राज्य सरकार ही सभी सदस्यों की नियुक्ति करेगी। इसमें दो गैर-मुस्लिम सदस्य, शिया, सुन्नी, पिछड़े वर्ग के मुस्लिम, बोहरा और आगा-खानी समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा। कम से कम दो मुस्लिम महिलाएं भी सदस्य होंगी।

वक्फ ट्रिब्यूनल की संरचना बदली:

पहले ट्रिब्यूनल में एक न्यायाधीश, एक अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट और एक मुस्लिम क़ानून विशेषज्ञ शामिल होता था। नए विधेयक में मुस्लिम क़ानून विशेषज्ञ की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है। अब ट्रिब्यूनल में ज़िला न्यायालय का न्यायाधीश अध्यक्ष होगा और एक राज्य सरकार का संयुक्त सचिव सदस्य होगा।

उच्च न्यायालय तक पहुंच और केंद्र की भूमिका बढ़ी

1995 के कानून के तहत वक्फ विवादों में हाईकोर्ट की भूमिका सीमित थी। अब ट्रिब्यूनल के निर्णयों को 90 दिनों के भीतर हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी।

केंद्र सरकार की भूमिका भी बढ़ गई है। पहले वक्फ खातों की ऑडिट की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों के पास थी। अब केंद्र सरकार वक्फ पंजीकरण, लेखा और ऑडिट से जुड़े नियम बना सकेगी। ऑडिट की ज़िम्मेदारी CAG या केंद्र द्वारा नामित अधिकारी को दी जाएगी।

बोहरा और आगा-खानी वक्फ बोर्ड का प्रावधान

1995 के कानून में यह प्रावधान था कि अगर शिया वक्फ संपत्ति कुल वक्फ संपत्तियों के 15% से ज़्यादा हो, तो शिया वक्फ बोर्ड बनाया जा सकता है। अब यह प्रावधान बोहरा और आगा-खानी समुदायों के लिए भी लागू होगा।

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